Shayari

जमाना बड़े शौक से …

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1. जमाना बड़े शौक से सुन रहा था /

हम ही सो गए अपनी दास्तां कहते-कहते //

2. जमाना भी अजीब है,नाकामयाब लोगों का मज़ाक उड़ाता है 

   कामयाब लोगों से जलता है //

3। मकानों के भाव यूँ ही बड़ गए….

परिवारों के झगड़ों में बिल्डर कमा गए //

4। कभी मतलब के लिए तो कभी बस दिल्लगी के लिए 

हर कोई मोहब्बत ढूंढ रहा है यहाँ अपनी ज़िंदगी के लिए //

5. अदरक की गाठों सा रहा बचपन अपना …

     बस उतना ही सुधरे जितना कुटे गए //

6. अजीब दास्तां है लोगों की , रोज़ ज़िंदगी में रंग बदल के जीते है
    और होली पर कहते है मुझे रंग से अलर्जी है //

7. क्या बेच कर हम तुझे खरीदें “ए ” जिंदगी “,
     सब कुछ तो “गिरवी ” पड़ा है ज़िम्मेदारी के बाज़ार में /

कृपया इन्हें भी देखें

एक आखिरी ख़त लिखने की ख्वाईश थी।

अब हम और …..

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